मेरे जज़्बात
किसको बताऊं दिल की जाकर, मैं तो खुद से छिप कर बैठा हूं । दर्द, दुखांत, उदासियों को, मैं खुदमें लिफकर बैठा हूं । बस कलम से है बंधन मेरा, तभी बेयान यह लिख कर बैठा हूं । किसको बताऊं दिल की जाकर, मैं तो खुद से छिप कर बैठा हूं । मेरी जिंदगी की क्या बात करूँ, यह हशर है हसीन नहीं । आए है बड़े शिकवे इसमें , यह बेरंग है रंगीन नहीं । यह सावन की बरसातों में, मैं किसकी दीद कर बैठा हूं । किसको बताऊं दिल की जाकर, मैं तो खुद से छिप कर बैठा हूं कवि द्वारा सन्देश: इस कविता में मैने उस जज़्बात की बात की है जो हर एक इंसान मै छुपा होता है और जो वह किसी से कह नहीं पाता।