बहु या बेटी?

 ये जेवर सब ले लो,

महंगे सब कपड़े भी ले लो।
उसे वो मायके-सी आज़ादी दे दो।।ये जेवर सब ले लो,
महंगे सब कपड़े भी ले लो।
उसे वो मायके-सी आज़ादी दे दो।।

सर पर रखा ये पल्लू,
बहु की मर्यादा समझाता है।
झुका हुआ ये सर उसको,
पहले-सा इतराना याद दिलाता है।।

याद दिलाती है ये ठंडी हवा,
बालों का आज़ाद वो लहलाहाना।
रसोई की गर्मी से,
माँ की कमर का वो भीग जाना।।

याद दिलाती है इस घर की बेटियाँ,
उस घर के उसके नख़रे सभी।
कहना उसकी माँ का,
काम नहीं करेगी, बेटी छोटी है अभी।।
बहु बनकर समझ आया,

बेटी होना क्या था?
सास भी प्यारी है यहाँ,
पति भी प्यारा।
माँ जैसा मग़र वो दुलार कहाँ?

वो कहते है कि
क़िस्मत से उसे, ये घर मिला है।
क़ीमत शायद इनको, नहीं पता है।।

उसके माँ-बाप की वो थकी-बूढ़ी आँखे,
सब कुछ बयाँ करती है।
उसके होंठों की ये झूठी हँसी,
सब कुछ बयाँ करती है।।

बेटी से बहु बनने का ये सफ़र,
सब कुछ होते हुए भी,
कुछ कमी-सी है।
ख़ुशी बहुत है उसे,
पर सहमी-सी है।।

एक बदलाव की आस में,
कुछ बदलने के लिए तैयार।
वो बहु हर रोज़,
बेटी बनने की ख्वाईश में है।।

                                            ~वसीम अकरम


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